महाभारत की एक अनसुनी और अनोखी कथा – क्य आप जानते है जब कुरुक्षेत्र मैदान में दिया था महायोद्धा कर्ण ने गुप्त रूप से धनुर्धारि अर्जुन को जीवनदान | mahabharat ki ek ansuni aur anokhi katha- kya aap jaante hai Jab kurukshetra mein diya tha mahayodha karam ne gupt roop se dhanurdhari arjun ko jeevandaan
महाभारत की एक अनसुनी और अनोखी कथा – क्य आप जानते है जब कुरुक्षेत्र मैदान में दिया था महायोद्धा कर्ण ने गुप्त रूप से धनुर्धारि अर्जुन को जीवनदान | mahabharat ki ek ansuni aur anokhi katha- kya aap jaante hai Jab kurukshetra mein diya tha mahayodha karam ne gupt roop se dhanurdhari arjun ko jeevandaan

महाभारत की एक अनसुनी और अनोखी कथा – क्य आप जानते है जब कुरुक्षेत्र मैदान में दिया था महायोद्धा कर्ण ने गुप्त रूप से धनुर्धारि अर्जुन को जीवनदान | mahabharat ki ek ansuni aur anokhi katha- kya aap jaante hai Jab kurukshetra mein diya tha mahayodha karan ne gupt roop se dhanurdhari arjun ko jeevandaan

महाभारत की एक अनसुनी और अनोखी कथा – क्य आप जानते है जब कुरुक्षेत्र मैदान में दिया था महायोद्धा कर्ण ने गुप्त रूप से धनुर्धारि अर्जुन को जीवनदान | mahabharat ki ek ansuni aur anokhi katha- kya aap jaante hai Jab kurukshetra mein diya tha mahayodha karan ne gupt roop se dhanurdhari arjun ko jeevandaan

महाभारत के युद्ध (mahabharat war) में कर्ण भले ही अधर्म के पक्ष में खड़े हो परन्तु उनमे माता कुंती और सूर्य देवता का अंश थाl कर्ण ने कई जगहों पर अपने नैतिकता का परिचय दिया थाl

आज आप कर्ण के सम्बन्ध में(relation)  जो कथा सुनने जा रहे इस कथा को पढ़कर आप जानेगें की कौरवों के साथ अधर्म का मार्ग अपनाने के बावजूद कर्ण में नैतिकता जागृत थीl

महाभारत के युद्ध में भीष्म पितामाह (bhishma pitamah) ने यह शर्त रखी थी की जब तक वह कौरवों के प्रधान सेनापति है तब तक कर्ण कौरवों के पक्ष (side) से युद्ध में हिस्सा (can’t take part in war) नहीं ले सकतेl भीष्म पितामह की इस शर्त के कारण विवश कर्ण अपने पड़ाव में बैठे युद्ध का समाचार सुनते (listening news of war) रहते और छटपटाते रहते थेl

जब अर्जुन के प्रहारों से भीष्म पितामह बाणों के शरशय्या पर पड़ गए तब गुरु द्रोण कौरव सेना के प्रधान सेनापति हुए तथा दुर्योधन (duryodhan) के कहने पर गुरु द्रोण ने कर्ण को इस युद्ध में हिस्सा लेने की आज्ञा (permission) दे दीl अब कर्ण भी युद्ध में शामिल हो चुके थे और महाभारत का यह युद्ध अपनी चरम सीमा (top level) पर थाl

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भगवान श्री कृष्ण (bhagwan shri krishan ji) हर समय यह प्रयास करने की कोशिश करते कि युद्ध में कहीं अर्जुन और कर्ण का एक दूसरे से सामना ना हो जाएl एक बार कुरुक्षेत्र में अर्जुन और कर्ण का एक दूसरे से सामना हो ही गया तथा दोनों एक दूसरे पर तीरों की वर्षा (rain of arrows) करने लगेl कर्ण अब अर्जुन पर हावी होने लगे थेl कर्ण  ने अर्जुन (arjun) पर अनेक तेज बाणों से प्रहार करना शुरू कियाl कर्ण का जब एक भयंकर आघात अर्जुन पर आया तो श्री कृष्ण ने अपना रथ नीचे कर दियाl

कर्ण का वह बाण अर्जुन के मुकुट के ऊपरी हिस्से को काटता हुआ निकला और आश्चर्य की बात तो यह थी की वह बाण वापस कर्ण के तरकस में आ गया तथा क्रोधित (angry) होकर कर्ण से तर्क-वितर्क करने लगाl

कर्ण के द्वारा छोड़ा गया वह बाण क्रोधित अवस्था में कर्ण के तरकस में वापस आया था बोला- कर्ण अबकी बार जब तुम अर्जुन पर निशाना साधो तो ध्यान रहे कि निशाना अचूक होना चाहिएl अगर में लक्ष्य (target) पर लग गया तो हर हाल में अर्जुन मृत्यु (death) को पा जाएगा तथा उसकी रक्षा किसी भी हालत में नहीं हो सकतीl इस बार पूरा प्रयत्न करो तुम्हारी प्रतिज्ञा अवश्य ही पूर्ण होगीl

कर्ण ने जब यह सुना तो उन्हें बड़ा आश्चर्य हुआ तथा उन्होंने उस बाण से उसका परिचय पूछा (introduction) व बोले मेरा अर्जुन के वध (kill) करने का संकल्प लेने के पीछे कई कारण है परन्तु मैं यह जानना चाहता हूँ कि आखिर आप के मन में अर्जुन के वध को लेकर इतनी प्रबल इच्छा क्यों है ?

कर्ण के यह पूछने पर उस बाण में से एक सर्प (snake) प्रकट हुआ, वास्तविकता (reality) में उस बाण में एक सर्प का वास थाl  उसने कर्ण को अर्जुन से द्वेष रखने का कारण बताते हुए एक कथा सुनाई l

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सर्प बने बाण ने अपना परिचय देते हुए कर्ण से कहा, हे ! वीर मैं कोई साधारण तीर (normal arrow) नहीं हूँ, मैं महासर्प अश्वसेन हूँ l अर्जुन से प्रतिशोध (revenge) लेने के लिए मेने बहुत लम्बी साधना और प्रतीक्षा कर रखी है इसलिए आज मैं तुम्हारी तरकश में हूँ क्योकि एक तुम ही हो जिसमे अर्जुन से समाना करने का सामर्थ्य हैl

अर्जुन ने एक बार खांडव वन में आग (fire in the jungle) लगा दी थीl आग इतनी प्रचण्ड थी कि उस आग ने वन (forest) में सब कुछ जलाकर राख कर दिया थाl उस वन में मैं अपने परिवार के साथ रहता था तथा उस प्रचण्ड अग्नि ने मेरे पूरे परिवार को जला दिया (my whole family burn) व मैं उनकी रक्षा नहीं कर पायाl

इसके प्रतिशोध के लिए मेने बहुत लम्बी प्रतीक्षा (waited for very long time) की है l तुम सिर्फ ऐसा करो कि मुझे अर्जुन के शरीर तक पहुंचा दो इसके आगे का शेष कार्य मेरा घातक विष (dangerous poison) कर देगाl

कर्ण ने उस सर्प से कहा हे ! मित्र मैं आपकी भावनाओ का सम्मान (respect your feelings) करता हूँ परन्तु मैं यह युद्ध अन्य साधन के साथ नहीं बल्कि अपने पुरुषार्थ व नैतिकता के रास्ते पर चलकर जितना चाहता हूँ l

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मैं दुर्योधन के पक्ष से युद्ध में खड़ा हूँ किन्तु इसका यह अभिप्राय न निकाले कि मैं सदैव अनीति का साथ दूंगा, यदि नीति के रास्ते पर चलते हुए अर्जुन मेरा वध (killed me) भी कर दे तो मैं हँसते हँसते मृत्यु को गले लगा लूंगा परन्तु यदि अनीति के राह पर चलते हुए मैं अर्जुन का वध करू तो यह मुझे बिलकुल भी स्वीकार नहीं (not acceptable) हैl

अश्वसेन ने कर्ण से बोला कि हे ! वीर तुम में एक सच्चे योद्धा की विशेषता (specialty of true warrior) है अतः मेरी नजर में तुम अभी से विजय (you are winner in my eyes) हो चुके होl यदि तुम ने अपने जिंदगी में कोई अनीति का कार्य किया भी तो वह तुम्हारी असंगति का कारण थाl यदि आप इस युद्ध में पराजित भी होते हो तो भी आपकी कीर्ति (famous) बनी रहेगीl

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