तेनाली राम की हिंदी कहानिया – रिवाज – Story of Tenali Raman – Rivaj

तेनाली राम की हिंदी कहानिया – रिवाज – Story of Tenali Raman – Rivaj

एक बार तेनालीराम (tenaliram) और महाराज में बहस छिड़ गई कि लोग किसी की बात पर जल्दी विश्वास (believe) कर लेते हैं या नहीं? तेनालीराम का कहना था कि लोगों को आसानी से बेवकूफ (easily stupid) बनाकर अपनी बात मनवायी जा सकती है ।

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महाराज का कहना था कि यह गलत (wrong) है । लोग इतने मूर्ख नहीं कि किसी की बात पर भी आख मूंदकर विश्वास (trust) कर लें । महाराज ने कहा: ”तुम किसी से भी जो चाहो नहीं करवा सकते ।” ”क्षमा करें महाराज! मैं अपने अनुभव (experience) से कह रहा हूं कि यदि आपमें योग्यता है तो आप सामने वाले से असम्भव (possible) से असम्भव कार्य भी करवा सकते हैं-बल्कि मै तो यहां तक कहूंगा कि यदि मैं चाहूं तो किसी से आप पर जूता (shoes) भी फिंकवा सकता हूं ।”

”क्या कहा ?” महाराज ने आखें तरेरीं- ” हम तुम्हें चुनौती देते हैं तेनालीराम (tenaliram) कि तुम ऐसा करके दिखाओ ।” ”मुझे आपकी चुनौती स्वीकार (accept your challenge) है महाराज!” तेनालीराम ने सिर झुकाया: ”किन्तु इसके लिए मुझे कुछ समय चाहिए ।” ”तुम जितना चाहो (need some time) समय ले सकते हो ।” दृढ़ता से महाराज ने कहा ।

और उस दिन बात आई-गई हो गई । तेनालीराम (tenaliram) और महाराज दोनों ही अपने-अपने कार्यों में व्यस्त (busy in works) हो गए । दो माह बाद महाराज कृष्णदेव राय ने कुर्ग प्रदेश के एक पहाड़ी सरदार की सुन्दर बेटी (beautiful daughter) से अपना विवाह तय किया । पहाड़ी इलाके के सरदार को विवाह (marriage) के समय महाराज के परिवार के रीति-रिवाजों का पता न था ।

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उसने जब महाराज के सामने अपनी यह परेशानी (problem) रखी तो वे बोले: ”इस विषय में तुम्हें किसी प्रकार की चिन्ता करने की आवश्यकता नहीं है-हमें केवल आपकी पुत्री चाहिए ।” परन्तु सरदार फिर भी न माना । वह अपनी इकलौती बेटी के विवाह (marriage of daughter) में किसी भी प्रकार की कमी नहीं रखना चाहता था, अत: उसने चुपचाप तेनालीराम (tenaliram) से सम्पर्क किया ।

तेनालीराम (tenaliram) ने उसकी समस्या जानकर दिलासा दी कि आप चिन्ता न करें, मैं सभी रस्में अदा करवाने वहां उपस्थित (available) रहूंगा । सरदार को बेहद प्रसन्नता हुई । मगर तेनालीराम (tenaliram) ने उसे समझा दिया कि वह इसे बात का जिक्र किसी से न करे ।

तेनालीराम (tenaliram) ने उससे कहा: ”महाराज कृष्णदेव राय के वंश में एक रिवाज (tradiion) यह भी है कि विवाह की सभी रस्में पूरी हो जाने पा दुल्हन (bride) अपने पांव से मखमल की जूती उतारकर सजा दा फेंकना बाद दूल्हा दुल्हन को अपने घर ले जाता है ।

मैं चाहता हूं कि लगे हाथों यह रस्म रस्म (traditions) भी पूरी हो जाए, इसीलिए मैं गोवा के पुर्तगालियों से एक जोड़ा जूतियां भी ले आया हूं । पुर्तगालियों ने मुझे  बताया यह रिवाज तो यूरोप में भी है, लेकिन वहां चमड़े के जूते (leather shoes) फेंके जाते हैं । हमारे यहां तो चमड़े की जुती की बात सोची भी नहीं जा सकती । हां, मखमल की जूती की बात कुछ और ही है । ”

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”एक बार और सोच लें तेनालीराम (tenaliram) जी-जूती तो जूती ही होती है, फिर चाहे वह मखमल को हो या चमड़े की । पत्नी द्वारा पति पर जूती फेंकना (throw shoes) क्या उचित होगा?” सरदार ने शंकित लहजे में कहा: “हम तो बेटी वाले हैं, कहीं ऐसा न हो कि लेने के देने पड़ जाएं ।” ”देखिए साहब! विजय नगर (vijay nagar) के राजघराने में यह रस्म तो होती ही आई है ।

अब आप यदि इसे न करना चाहें तो कोई बात नहीं ।” ”नहीं-नहीं तेनालीराम जी! कोई भी रस्म अधूरी नहीं रहनी चाहिए यदि ऐसा हुआ तो ससुराल में बेटी को अपमानित (insulted) होना पड़ सकता है । लाइए वह जूती मुझे दीजिए । मैं अपनी बेटी के विवाह (marriage of daughter) में कोई कसर नहीं रखना चाहता ।”

विवाह (marriage) की बाकी सभी रस्में पूरी हो चुकी थीं । महाराज को डोली की विदाई का इंतजार (wait) था । दुल्हन को बाहर लाकर दहेज (doewry) के सामान के पास ही एक स्थान पर बैठा दिया गया था । अचानक दुल्हन (bride) ने अपने पांव से मखमल की जूती उतारी और मुस्कराते हुए महाराज (throw on king) पर फेंक मारी ।

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महाराज की भृकुटि तन गई । वह क्रोध और अपमान (anger and insult) से तिलमिलाकर उठना ही चाहते थे कि तभी पास बैठे तेनालीराम (tenaliram) ने उनका हाथ दबा दिया और जल्दी से उनके कान (ear) के पास मुंह ले जाकर बोले: ”महाराज! क्रोध न करें और इन्हें क्षमा कर दें । ये सब मेरा किया धरा है ।”

”ओह!” महाराज को तुरन्त उस दिन की बात याद आ गई और वह मुस्करा (smile) दिए । फिर रानी की जूती उठाकर उनके करीब आए और जूती वापस (give back the shoe) दे दी । ”क्षमा करें महाराज! आपके वंश की रस्म अदा करने के लिए…।” ”कोई बात नहीं प्रिये-तेनालीराम हमें सब कुछ बता चुके हैं ।”

और फिर जब महल (mahal) लौट आए तो तेनालीराम से मुखातिब होकर वे बोले: ”तुमने ठीक ही कहा था तेनालीराम-लोग किसी की भी बात पर विश्वास (believe) कर लेते हैं ।”

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