तेनालीराम लालची नहीं स्वामी भक्ति है | Tenaliram Lalchi Nahi Swami Bhakti Hai

तेनालीराम लालची नहीं स्वामी भक्ति है | Tenaliram Lalchi Nahi Swami Bhakti Hai

एक बार महाराज (maharaj) कृष्णदेव राय ने किसी बात से प्रसन्न होकर तेनालीराम (tenaliram) को परातभर स्वर्ण मुद्राएं भेंट कीं और साथ ही यह भी कह दिया कि तेनालीराम (tenaliram) स्वयं इन स्वर्ण मुद्राओं से भरी परात को उठाकर दरबार (darbar) से लेकर जाएंगे ।

स्वर्ण मुद्राओं से भरी वह परात काफी भारी थी । दरबारी (darbari) मन ही मन हंस रहे थे कि आज बेचारे तेनालीराम (tenaliram) का जुलूस निकलेगा, क्योंकि स्वर्ण मुद्राओं से भरी परात वह किसी भी सूरत में उठा नहीं पाएगा । तेनालीराम (tenaliram) ने कोशिश की, मगर वह उस परात को हिला भी न पाया ।

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अचानक उसे एक युक्ति सूझी, उसने अपनी पगड़ी खोलकर फर्श पर बिछाई और जितनी स्वर्ण मुद्राएं उसमें आ सकती थीं, भरकर उसकी एक पोटली बना ली । बाकी मुद्राएं उसने अपने कुर्ते की जेबों में भर लीं । फिर पोटली को उसने झोली की भांति पीठ पर लादा और परात उठाकर सिर पर रखी और बाहर की ओर चल दिया ।

उसकी सूझ-बूझ देखकर सभी दरबारी (darbari) चकित रह गए । वे तो सोच रहे थे कि तेनालीराम (tenaliram) का मजाक उड़ाएंगे, मगर हुआ उल्टा ही । तभी महाराज (maharaj) ने ताली बजाकर ‘वाह-वाह’ कहते हुए उसकी सूझबूझ की प्रशंसा की, उनका अभिनंदन करने के लिए जैसे ही तेनालीराम (tenaliram) घूमा, वैसे ही उसकी जेब थोड़ी सी उधड़ गई और कुछ मुद्राएं बिखर गईं ।

तेनालीराम (tenaliram) ने गठरी और परात एक ओर रखी तथा बैठकर स्वर्ण मुद्राएं उठाने लगा । ”कितना लालची है ।” अचानक पुरोहित (purohit) ने चुटकी ली: ”एक परात स्वर्ण मुद्राएं मिली हैं, फिर भी दो-चार के लिए परेशान हो रहा है ।” दरबारी (darbari) भी मजा लेने लगे । कोई कहता : ”अरे देखो, एक उधर भी है, उधर कुर्सी के नीचे-उधर देखो, अपनी दाईं तरफ ।”

इसी प्रकार उससे जलने वाले दरबारी (darbari) उसे नचा रहे थे । तभी मंत्री ने महाराज (maharaj) से फुसफुसाकर कहा : ”ऐसा लालची आदमी मनैं अपने जीवन में नहीं देखा ।” महाराज (maharaj) को भी दो-चार मुद्राओं के लिए तेनालीराम (tenaliram) का इस प्रकार नाचना अच्छा न लगा । दरबारियों द्वारा उसका मजाक उड़ाते देख महाराज (maharaj) का मूड उखड़ सा गया और तनिक चिढ़कर वे बोले:

”अब बस भी करो तेनालीराम (tenaliram)! इतना लालच भी अच्छा नहीं होता । क्या तुम्हें परातभर मुद्राओं में सन्तोष नहीं हुआ जो दो-चार मुद्राओं के लिए इतने व्याकुल हो रहे हो ।” ”बात वो नहीं है अन्नदाता जो सब लोग समझ रहे हैं ।” तेनालीराम (tenaliram) हाथ जोड़कर  बोला : ”दरअसल इन सभी स्वर्ण मुद्राओं पर आपका चित्र और नाम अंकित है : मैं नहीं चाहता कि ये किसी की ठोकरों में आएं या झाडख से बुहारी जाएं ।”

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तेनालीराम (tenaliram) का ये उत्तर मजाक उड़ाने वाले दरबारियों के गाल पर तमाचे की तरह जाकर लगा और अगले ही पल पूरे दरबार (darbar) में सन्नाटा छा गया । महाराज (maharaj) पहले तो गम्भीर हुए मगर फिर एकाएक ही मुस्करा उठे और बोले : ”तेनालीराम (tenaliram) की स्वामीभक्ति अद्‌भुत है । इन्हें एक परांत भर स्वर्ण मुद्राएं और दी जाएं तथा दोनों परातों की स्वर्ण मुद्राएं सावधानीपूर्वक इनके घर पहुंचाई जाएं ।”

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