तेनालीराम और दक्षिणा | Tenaliram aur Dakshina

तेनालीराम और दक्षिणा | Tenaliram aur Dakshina

विजय नगर (vijay nagar)में एक अपाहिज और गरीब ब्राह्मण रहता था । चूंकि वह पैरों से अपाहिज था, इसलिए उसकी रोजी-रोटी का भी कोई ठिकाना न था । उसने कई बार महाराज (maharaj) कृष्णदेव राय के दरबार (darbar) में सहायता की गुहार की, किन्तु राजपुरोहित (purohit) ने कभी उसकी बात को सिरे नहीं चढ़ने दिया । वह न जाने क्यों उससे जलता था ।

एक दिन किसी ने उसे सलाह दी कि तुम तेनालीराम (tenaliram) के पास चले जाओ, वे तुम्हारे लिए अवश्य ही कुछ न कुछ करेंगे । तब साहस करके वह एक दिन तेनालीराम (tenaliram) के पास जा पहुंचा और उसे पूरी बात  बताई । तेनालीराम (tenaliram) ने बड़ी गम्भीरता से उसकी बात सुनी । क्षणभर कुछ सोचा, फिर उसके कान में कोई बात कहकर उसे विदा कर दिया ।

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उस दिन महाराज (maharaj) नर्मदा के दूसरे तट पर महर्षि आश्रम जाने वाले थे क्योंकि गुप्तचर की सूचना के अनुसार वहां कोई सिद्ध संत आने वाले थे । इस यात्रा पर तेनालीराम (tenaliram) को भी जाना था । तेनालीराम (tenaliram) इस यात्रा के लिए राजमहल जाने की तैयारी कर ही रहे थे कि वह अपाहिज ब्राह्मण आ गया ।

उसे विदा करके तेनालीराम (tenaliram) घर से निकले तो उन्हें याद आया कि यात्रा के लिए पानी का प्रबंध उन्हें ही करना है, क्योंकि उन दिनों गर्मी का मौसम था और भीषण गर्मी पड़ रही थी ।  अत: पानी का प्रबंध करते हुए तेनालीराम (tenaliram) राजमहल जा पहुंचे । उनके जाते ही काफिला चल पड़ा । आश्रम की दूरी लगभग दस कोस थी ।

पांच-छ: कोस चलने के बाद महाराज (maharaj) ने पड़ाव डालने की आज्ञा दी । आमों के छायादार वृक्षों के नीचे पड़ाव डल गया । सभी ने हाथ-मुंह धोकर भोजन प्रारम्भ किया । अभी भोजन चल ही रहा था कि न जाने कैसे पानी की गोल (बड़ा ढोलनुमा घड़ा) लुढ़क गई और देखते ही देखते पीने का सारा पानी बह गया । अब?

सभी परेशान-सभी के हाथ-मुंह भोजन से सने थे । महाराज (maharaj) ने हुक्म दिया : ”फौरन पीने के पानी की तलाश की जाए ।” सारे सैनिक और दरबारी (darbari) पानी की तलाश में इधर-उधर फैल गए । मगर वहां दूर-दूर तक पानी का नामी-निशान भी नहीं था ।

तभी एक दरबारी (darbari) आकर बोला : ”महाराज (maharaj)! दक्षिण दिशा में एक कुटिया में ठंडे पानी से भरे छ: घड़े रखे हैं, किन्तु कुटिया खाली है ।” ”तो क्या हुआ?” प्यास से बेचैन एक मंत्री बोला: ”सम्राट के लिए पानी को कौन मना कर सकता है । अधिक होगा तो मूल्य चुका देंगे ।”

मंत्री की बात से सभी सहमत हो गए । वे सभी कुटिया पर गए और हाथ-मुंह धोकर पानी पीने ही लगे थे कि कुटिया का मालिक आ गया । पुरोहित (purohit) ने उसे देखा तो चिढ़ गया । वह वही गरीब ब्राह्मण था जिसकी सहायता-याचना पर राजपुरोहित (purohit) अड़ंगे लगाता था ।

वहां आकर वह हाथ जोड़कर राजदरबारियों को पानी पीते देखता रहा । जब सब पानी पी चुके तो मंत्री ने उस गरीब ब्राह्मण से कहा : ”हमें प्यास लगी थी, आसपास कहीं पानी न मिला तो तुम्हारा पानी पी लिया । इसका जो मूल्य चाहो ले लो । बोलो, क्या मूल्य लोगे ?”

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गरीब ब्राह्मण कुछ बोलता, उससे पहले ही राजपुरोहित (purohit) बोल पड़ा : ”इससे क्या पूछना, दो-चार टके दे दें ।” गरीब ब्राह्मण हाथ जोड़कर बड़ी नम्रता से महाराज (maharaj) कृष्णदेव राय से बोला : ”नहीं महाराज (maharaj)! मैं पानी का मूल्य नहीं चाहता । हां, पानी को प्रसाद समझकर आप इस गरीब ब्राह्मण को कुछ दक्षिणा देना चाहें तो आशीर्वाद देकर स्वीकार कर लूंगा ।”

महाराज (maharaj) ने मुस्कराकर तेनालीराम (tenaliram) की ओर देखा, तब तेनालीराम (tenaliram) ने कहा : ”यह गरीब ब्राह्मण ठीक ही कहता है महाराज (maharaj) । इस संकट की घड़ी में पानी का मिलना भगवान का प्रसाद मिलने के समान ही है । अत: प्रसाद की दक्षिणा भी राजकुल के अनुरूप ही होनी चाहिए ।”

महाराज (maharaj) ने तुरन्त अपने गले से मणिमाला उतारकर गरीब ब्राह्मण को दे दी । पुरोहित (purohit) कसमसाकर रह गया । मंद मुस्कान होंठों पर बिखेरे तेनालीराम (tenaliram) राजपुरोहित (purohit) को कुढ़ते देखकर आनन्दित हो रहे थे ।

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