तेनालीराम और जाड़े की मिठाई | Tenaliram aur Jaade ki Mithai

तेनालीराम और जाड़े की मिठाई | Tenaliram aur Jaade ki Mithai

सर्दियों का मौसम था । महाराज (maharaj), तेनालीराम (tenaliram) और राजपुरोहित (purohit) राजमहल के उद्यान में बैठे धूप सेंक रहे थे । अचानक महाराज (maharaj) बोले : ”सर्दियों का मौसम सबसे अच्छा होता है, खूब खाओ और सेहत बनाओ ।” खाने-पीने की बात सुनकर पुरोहित (purohit) जी के मुंह में पानी आ गया ।

वे बोले : ”महाराज (maharaj)! सर्दियों में मेवा और मिठाई खाने का अपना अलग ही आनन्द है-वाह क्या मजा आता है ।” ”अच्छा बताओ ।” एकाएक महाराज (maharaj) ने पूछा: ”जाड़े की सबसे अच्छी मिठाई कौन सी है?”  ”एक थोड़ी है महाराज (maharaj)! हलवा, माल-पुए पिस्ते की बर्फी ।” पुरोहित (purohit) जी ने इस उम्मीद में ढेरों चीजें गिनवा दीं कि महाराज (maharaj) कुछ तो मंगवाएंगे ही ।

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महाराज (maharaj) ने तेनालीराम (tenaliram) की ओर देखा : ”तुम बताओ तेनालीराम (tenaliram)तुम्हें जाड़े के मौसम की कौन सी मिठाई पसँद है ?” ”जो मिठाई मुझे पसंद है, वह यहां नहीं मिलती महाराज (maharaj) ।” ”फिर कहां मिलती है?” महाराज (maharaj) ने उत्सुकता से पूछा: ”और उस मिठाई का नाम क्या है?”

”नाम पूछकर क्या करेंगे महाराज (maharaj): आप आज रात को मेरे साथ चलें तो वह बढ़िया मिठाई मैं आपको खिलवा भी सकता हूं ।” ”हम अवश्य चलेंगे ।” और फिर-रात होने पर वे साधारण वेश धारण करके तेनालीराम (tenaliram) के साथ चल दिए ।

चलते-चलते तीनों एक गाँव में निकल आए । गांव पार करके खेत थे । ”अरे भई तेनालीराम (tenaliram)! और कितनी दूर चलोगे?” ”बस महाराज (maharaj)! समझिए पहुँच ही गए । वो सामने देखिए अलाव जलाए कुछ लोग जहां बैठे हैं, वहीं मिलेगी वह मिठाई ।”

कुछ देर में वे वहाँ पहुँच गए जहाँ कुछ लोग अलाव जलाए बैठे हाथ ताप रहे थे । क्योंकि तीनों ने ही वेश बदला हुआ और ऊपर से अँधेरा था, इसलिए कोई उन्हे पहचान ही नहीं पाया । वे भी उन्हीं लोगों के साथ बैठकर हाथ तापने लगे ।

पास ही एक कोल था जिसमें गन्तीं की पिराई चल रही थी । तेनालीराम (tenaliram) ने उन्हें बैठाया और कोल्ड की ओर चले गए । एक ओर बड़े-बड़े कढ़ाहों में रस पक रहा था ।  तेनालीराम (tenaliram) ने किसान से बात की और तीन पत्तलों में गर्मा-गर्म गुड़ ले आए ।

”लो महाराज (maharaj): खाओ मिठाई ।” तेनाली बोला: ”ये हें जाड़े को महाराज (maharaj) ने गर्मा-गर्म गुड खाया तो उन्हें बड़ा स्वादिष्ट लगा । ”वाह! ”वे बोले: ”यहां अंधेरे में ये मिठाई कहां से मिली ?” ”महाराज (maharaj)! ये हमारी धरती में पैदा होती है : क्यों पुरोहित (purohit) जी! कैसी लगी गर्मा-गर्मा मिठाई ?”

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राजपुरोहित (purohit) ने भी कभी गर्म-गर्म बनता हुआ गुड नहीं खाया था । वे बोले : ”मिठाई तो वाकई बड़ी स्वादिष्ट है ।” ”ये गुड़ है महाराज (maharaj) ।” “गुड़?” महाराज (maharaj) चौके: ”ये कैसा गुड़ है भई-गर्मा-गर्म और स्वादिष्ट ।” ”ये गर्मा-गर्म है, इसलिए आपको और अधिक स्वादिष्ट लग रहा है ।

महाराज (maharaj)! वास्तव में सर्दियों की मेवा तो गर्मी है : ”रसगुल्ले बड़े स्वादिष्ट होते है, मगर सर्दियों में आपको इतने स्वादिष्ट नहीं लगेंगे ।”  ”वाह तेनालीराम (tenaliram)मान गए ।” महाराज (maharaj) ने तेनालीराम (tenaliram) की पीठ ठोंकी ।

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