चाणक्य नीति का छठवां अध्याय | Chanakya Neeti ka Sixth Chapter

चाणक्य नीति का छठवां अध्याय | Chanakya Neeti ka Sixth Chapter

चाणक्य नीति का छठवां अध्याय | Chanakya Neeti ka Sixth Chapter – चाणक्य नीति , लगभग 2400 वर्ष पूर्व नालंदा विश्विधालय (Nalanda University) के महान आचर्य चाणक्य द्वारा लिखित एक महान ग्रन्थ है जो आज भी उतना ही प्रासंगिक है जितना उस समय था। चाणक्य नीति में कुल सत्रह अध्याय (chapter) (17 Chapters) है। यहाँ प्रस्तुत है चाणक्य नीति का छठवां (Sixth) अध्याय (chapter)।

1: मनुष्य शास्त्रों को पढ़कर धर्म (Dharma-Religion) को जानता है, मूर्खता को त्यागकर ज्ञान प्राप्त करता है तथा शास्त्रों को सुनकर मोक्ष प्राप्त करता है।

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2: पक्षियों (Birds) में कौवा, पशुओं में कुत्ता, ऋषि-मुनियों में क्रोध करने वाला और मनुष्यो में चुगली करने वाला चांडाल अर्थात नीच होता है।

3: कांसे का पात्र राख द्वारा मांजने से शुद्ध होता है, तांबे का पात्र खटाई के रगड़ने से शुद्ध होता है। स्त्री (woman) रजस्वला होने से पवित्र होती है और नदी (River) तीव्र गति से बहने से निर्मल हो जाती है।

4: प्रजा की रक्षा के लिए भृमण करने वाला राजा (King) सम्मानित होता है, भृमण करने वाला योगी और ब्राह्मण (Brahman) सम्मानित होता है, किन्तु इधर-उधर घूमने वाली स्त्री (woman) भृष्ट होकर नष्ट हो जाती है।

5: जिसके पास धन (money) है उसके अनेक मित्र (friend) होते है, उसी के अनेक बंधु-बांधव होते है, वही पुरुष (men) कहलाता है और वही पंडित (Pandit) कहलाता है।

6: जैसी होनहार होती है, वैसी ही बुद्धि हो जाती है, उध्योग-धंधा भी वैसा ही हो जाता है और सहायक (Friends) भी वैसे ही मिल जाते है।

7: काल (समय, मृत्यु) ही पंच भूतो (पृथ्वी,जल, वायु, अग्नि, आकाश) को पचाता है और सब प्राणियों का संहार भी काल ही करता है। संसार में प्रलय हो जाने पर वह सुप्तावस्था अर्थात स्वप्नवत रहता है। काल की सीमा को निश्चय ही कोई भी लांघ नहीं सकता।

8: जन्म से अंधे (Blind from Birth) को कुछ दिखाई नहीं देता, काम में आसक्त व्यक्ति (person) को भला-बुरा कुछ सुझाई नहीं देता, मद से मतवाला बना प्राणी कुछ सोच नहीं पाता और अपनी जरूरत को सिद्ध करने वाला दोष नहीं देखा करता।

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9: जीव स्वयं ही (नाना प्रकार के अच्छे-बुरे) कर्म करता है, उसका फल भी स्वयं ही भोगता है। वह स्वयं ही संसार की मोह-माया में फंसता है और स्वयं ही इसे त्यागता है।

10: राजा अपनी प्रजा के द्वारा किए गए पाप को, पुरोहित राजा के पाप को, पति अपनी पत्नी के द्वारा किए गए पाप को और गुरु अपने शिष्य के पाप को भोगता है।

11: कर्जदार पिता शत्रु (enemy) है, व्यभिचारिणी माता शत्रु (enemy) है, मूर्ख (Stupid) लड़का शत्रु (enemy) है और सुन्दर (Beautiful) स्त्री (woman) शत्रु (enemy) है।

12: लोभी को धन (money) से, घमंडी को हाथ जोड़कर, मूर्ख को उसके अनुसार व्यवहार से और पंडित को सच्चाई से वश में करना चाहिए।

13: बिना राज्य के रहना उत्तम है, परन्तु दुष्ट राजा (Evil King) के रहना अच्छा नहीं है। बिना मित्र (friend) (Without Friend) के रहना अच्छा है, किन्तु दुष्ट मित्र (friend) के साथ रहना उचित नहीं है। बिना शिष्य के रहना ठीक है, परन्तु नीच शिष्य को ग्रहण करना ठीक नहीं है। बिना स्त्री (woman) के रहना उचित है, किन्तु दुष्ट और कुल्टा स्त्री (woman) के साथ रहना उचित नहीं है।

14: दुष्ट राजा के राज्य में प्रजा को सुख कहा? दुष्ट मित्र (friend) से शांति कहा? दुष्ट स्त्रियों से घर में सुख कहा? दुष्ट विध्यार्थियों को पढ़ाने से यश कहा? अर्थात ये सभी दुःख देने वाले है। इनसे सदैव अपना बचाव करना चाहिए।

15: शेर और बगुले से एक-एक, गधे से तीन, मुर्गे से चार, कौए से पांच और कुत्ते से छः गुण (मनुष्य को) सीखने चाहिए।

16: काम छोटा हो या बड़ा, उसे एक बार हाथ में लेने के बाद छोड़ना नहीं चाहिए। उसे पूरी लगन और सामर्थ्य के साथ करना चाहिए। जैसे सिंह पकड़े हुए शिकार को कदापि नहीं छोड़ता। सिंह का यह एक गुण अवश्य लेना चाहिए।

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17: सफल व्यक्ति (person) वही है जो बगुले के समान अपनी सम्पूर्ण इन्द्रियों को संयम में रखकर अपना शिकार करता है। उसी के अनुसार देश, काल और अपनी सामर्थ्य को अच्छी प्रकार से समझकर सभी कार्यो को करना चाहिए। बगुले से यह एक गुण ग्रहण करना चाहिए, अर्थात एकाग्रता के साथ अपना कार्य करे तो सफलता (success) अवश्य प्राप्त होगी, अर्थात कार्य को करते वक्त अपना सारा ध्यान उसी कार्य की और लगाना चाहिए, तभी सफलता (success) मिलेगी।

18: अत्यंत थक जाने पर भी बोझ को ढोना, ठंडे-गर्म का विचार (thought) न करना, सदा संतोषपूर्वक विचरण करना, ये तीन बातें गधे (Donkey) से सीखनी चाहिए।

19: ब्रह्मुहूर्त में जागना, रण में पीछे न हटना, बंधुओ में किसी वस्तु का बराबर भाग करना और स्वयं चढ़ाई करके किसी से अपने भक्ष्य को छीन लेना, ये चारो बातें मुर्गे से सीखनी चाहिए। मुर्गे में ये चारों गुण होते है। वह सुबह उठकर बांग देता है। दूसरे मुर्गे (Cock-Hen) से लड़ते हुए पीछे नहीं हटता, वह अपने खाध्य को अपने चूजों के साथ बांटकर खाता है और अपनी मुर्गी को समागम में संतुष्ट रखता है।

20: मैथुन गुप्त स्थान में करना चाहिए, छिपकर चलना चाहिए, समय-समय पर सभी इच्छित वस्तुओं का संग्रह करना चाहिए, सभी कार्यो में सावधानी रखनी चाहिए और किसी का जल्दी विश्वास नहीं करना चाहिए। ये पांच बातें कौवे से सीखनी चाहिए।

21: बहुत भोजन (food) करने की शक्ति रखने पर भी थोड़े भोजन (food) (Food) से ही संतुष्ट हो जाए, अच्छी नींद सोए, परन्तु जरा-से खटके पर ही जाग जाए, अपने रक्षक से प्रेम करे और शूरता दिखाए, इन छः गुणों को कुत्ते से सीखना चाहिए।

22: जो मनुष्य उपरोक्त बीस गुणों को अपने जीवन में उतारकर आचरण करेगा, वह सदैव सभी कार्यो में विजय प्राप्त करेगा।

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